Tuesday, 2 April 2013


सिनेमा, बाज़ार एवं अहिंसक सिनेमा का अभाव

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी
पूर्व राष्ट्रपति महामहिम श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटील के सम्पादक
उप सम्पादक मध्यभारती रिसर्च जर्नल
सहायक प्रोफ़ेसर/निदेशक
यू. जी. सी.-अकादमिक स्टाफ कॉलेज
डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश)
मो. 08989154081, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com  or kanhaiyatripathi@yahoo.co.in
"We have just 16,000 theatres in India and there are so many filmmakers. How will we cater to that? Cinema is both business and art. As a business it will survive but as an art I am not sure."-Shekhar Kapoor, Director (Queen Elizabeth- "Elizabeth" and its sequel "The Golden Age")

सौ सालों के हिन्दुस्तानी सिनेमा को आप कहाँ खड़ा पाते  हैं ओम पुरी: बैठा हुआ ज्यादा है क्योंकि सबसे ज्यादा कायदे से जब खड़ा हुआ था सिनेमा वह था पचास और साठ के दशक में.
(हंस के एक साक्षात्कार से अंक: 7, फरवरी, 2013)



सारांश
    सिनेमा के सौ वर्ष पूरे हो चुके हैं और अब भारतीय सिनेमा पूरे विश्व में अपने होने का एहसास सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक चेतना प्रदाता के रूप में चिन्हित किया जाने लगा है. इसमें कोई दो मत नहीं कि पिछले सौ वर्षों में भारत ऑस्कर जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार को भी प्राप्त कर दुनिया में जाना पहचाना जा रहा है. जो भी हो अब भारत  की आर्थिक नगरी मुंबई सिनेमा के जरिये दुनिया को तब तक आकर्षित करती रहेगी जब तक सिनेमा का अस्तित्वा रहेगा. लेकिन भूमंडलीकरण और उदारीकरण के बाद सिनेमा के सांस्कृतिक संवेदना से विचलन और मल्टीप्लेक्स की ओर झुकाव साथ ही हिंसा की सिनेमा में अधिकता सिनेमा के वास्तविक सौन्दर्य को कहीं न कहीं ठेस पहुंचाया है. सिनेमा से सांस्कृतिक क्रान्ति तो ज़रूर हुई लेकिन बदलते सिनेमा के सौन्दर्यबोध से एक बड़ा वर्ग खिन्न सा है इसलिए सिनेमा की संस्कृति क्या बाज़ार और मुनाफ़ा के संस्कृति में कहीं तब्दील होने में तो आमादा नहीं है और क्या हो सकते हैं मुख्यधारा के दर्शक के भविष्य इस प्रपत्र में इन्हीं पहलुओं पर विचार किया गया है
प्रस्तावना
सिनेमा सौ साल का हो चुका है. सिनेमा के बारे में रैल्फ फॉक्स का कथन था-इस विधा का कोई भविष्य नहीं है. हम जानते हैं कि रैल्फ फॉक्स की बातें अब ख़ारिज हो चुकी हैं और सिनेमा अपने इन्द्रधनुषी छटा के साथ आज क्षितिज  में अपनी चमक और उपस्थिति से अपनी आवश्यकता और उपयोगिता को अब स्पष्ट कर चुका है. मूक और सवाक फिल्मों से लेकर अब तक के सिनेमा-सफ़र से पूरी दुनिया सुपरिचित हो चुकी है और सिनेमा के महत्त्व को जान भी चुकी है. हमें यह जानकार प्रसन्नता होती है कि भारत एकमात्र ऐसा देश है, जहां सिनेमा अपनी परम्‍परा, सौंदर्यबोध और मानसिकता के प्रति निष्‍ठावान है।

सिनेमा के शुरू के दिन
भारतीय फिल्‍म उद्योग ने 1913 में दादा साहेब फाल्‍के की पहली फिल्‍मराजा हरीशचंद्र के साथ पहले कदम की शुरूआत किया था और इसके बाद हीरालाल सेन की द फ्लॉवर ऑफ पर्सिया, अरदेशिर ईरानी की आलम आरा के साथ-साथ एच.एम. रेड्डी द्वारा निर्देशित फिल्‍म भक्‍त प्रह्लाद और कालीदास जैसी फिल्‍मों के माध्‍यम से अपना उत्‍थान किया। इन फिल्‍मों ने सिनेमा के जादू को देशभर में फैला दिया और फिल्‍मों के माध्‍यम से पूर्ण मनोरंजन की मांग भी उठने लगी।
वी.शांताराम, बिमल राय, राजकपूर, गुरूदत्त, सत्‍यजीत रे, रित्विक घटक, के. आसिफ, के. वी. रेड्डी, एल. वी. प्रसाद, रामू करेत और महबूब खान जैसे फिल्‍म निर्माताओं ने भारतीय फिल्‍म उद्योग को एक शानदार स्‍वरूप देने में बेहद महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। समय के साथ भारतीय सिनेमा अंतर्राष्‍ट्रीय मंच पर पहुंच गया और भारतीय सिनेमा के स्‍वरूप और भाव ने राजकपूर, देवानंद, दिलीप कुमार, अशोक कुमार, शम्‍मी कपूर, मनोज कुमार और सुनील दत्त जैसे शानदार अभिनेताओं और गीता दत्त, मधुबाला, वहीदा रहमान, नरगिस, नूतन, साधना, माला सिन्‍हा और अन्‍य अभिनेत्रियों को चरमोत्‍कर्ष पर पहुंचाया।

सिनेमा ने भारत समेत दुनिया में अपनी तरह की क्रान्ति किया है यह अब सर्वमान्य हो चुका है. आज भारतीय सिनेमा उद्योग विश्‍व में फिल्‍मों का सबसे बड़ा निर्माता है। आज देश में प्रतिवर्ष दो हजार से भी अधिक फिल्‍मों का निर्माण हो रहा है। सिनेमा के प्रारंभिक वर्षों में जहां एक हजार रूपये का साधारण सा राजस्‍व प्राप्‍त होता था, वर्ष 2011 में भारतीय सिनेमा उद्योग प्रगति करके सौ अरब रूपये से अधिक का उद्योग बन गया है। यह उपलब्धि उद्योग द्वारा पिछले सौ वर्षों में अर्जित महत्‍वपूर्ण प्रगति की साक्षी है। कुल मिलाकर यह उत्‍साहजनक है कि भारत का मीडिया और मनोरंजन उद्योग 12 प्रतिशत विकास के साथ साढ़े सात सौ अरब रूपये के स्‍तर पर पहुंच गया है। केपीएमजी की नवीनतम अनुसंधान रिपोर्ट में यह भविष्‍यवाणी की गई है कि उद्योग 15 प्रतिशत की सीएजीआर अर्जित करके वर्ष 2016 तक 1457 अरब रूपये के स्‍तर पर पहुंच जाएगा। यह फिल्म जगत के अच्छी खबर हो सकती है. 
उदारवाद और मल्टीप्लेक्स के आगमन के साथ

फिलहाल, सिनेमा जगत में आर्थिक उदारवाद के बाद मल्टीप्लेक्स का आगमन हुआ तथा बड़े औद्योगिक घराने भी इस ओर अपना हाँथ आजमाने के लिए आगे बढ़े. या हम इसे यूं कहें कि सिनेमा में बाज़ार देखते निर्माता/निर्देशक मल्टीप्लेक्स के जरिये हाँथ आजमाने के लिए आमादा हो गए. इसकी वजह लोग यह बताते हैं कि माधुरी दीक्षित और सलमान खान अभिनीत में सूरज बड़जात्या ने “हम आपके हैं कौन” बनाया और उससे सौ करोड़ से ज्यादा का मुनाफ़ा आद्योगिक घराने को आकर्षित किया. इस प्रकार सिनेमा के लिए नहीं बल्कि मुनाफे के लिए बढ़ा एक बड़ा तबका यू. एस. डालर-सिनेमा में अपने बड़े लाभ का भविष्य देखने लगा.
बाज़ार के नशे बहुत ही कारसाज होते हैं. वह लुभाता ज़रूर है लेकिन एक ख़ास छोर पर भी ले जाने लगता है. जैसा कि जब सिनेमा का भविष्य डालर-दर्शक बनाने लगा तो सिनेमा उनके टेस्ट को ध्यान में रखकर निर्माता/निर्देशक बनाने लगे. इससे अब सिनेमा के व्यापारी आम दर्शक यानी मुख्यधारा के आम दर्शक से दूर हो गया. बिहार, यू.पी. और मध्य प्रदेश और खासकर हिंदी पट्टी के लोग उनके लिए अब गौड़ हो गए. कमाई ने निर्माता/निर्देशकों को प्रमाद और अहंकार से लबरेज कर दिया फलतः हम देखेंगे कि सिनेमा से वह भारतीय संस्कृति के सौन्दर्य भी विलुप्त होने लगे जिसे भारत के लोग सिनेमा देखते समय खोजा करते हैं. दरअसल, उन्हें लन्दन, मैनहट्टन, स्विटजरलैंड या किसी ऐसे शहर की अपेक्षा नहीं होती न ही अर्धनग्न या खुले संस्कृति की पोषक नायिकाओं के टेस्ट चाहिए.
लेकिन पूंजी लगाने और लूटने के लिए सिनेमा के नए आये ठेकेदार भोंडापन, अश्लीलता, लफ्फाजी, हिंसा, असभ्य सिनेमांकन करना भारतीय सिनेमा में अपनी कलाधर्मिता बताते नहीं अघाते. यद्यपि यह समस्त सिनेमा के तत्त्व कभी भी न तो सिनेमा के सौन्दर्यबोध थे और न हो सकते हैं. और अब जब सिनेमा का सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं तो तमाम विमर्शकार भले ही प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ऐसे बड़े निर्माताओं/निर्देशकों का समर्थन करें लेकिन मेरी दृष्टि से मूल्यगत व साभ्यातिक सिनेमा ही टिकाऊ संस्कृति के साथ ज्यादा समय तक स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकता है. और यह तभी संभव है जब साहित्य से सिनेमा का सीधा संवाद और तादात्म्य बनेगा.
फिलहाल, इससे चिंतित होना लाज़मी है. लेकिन सिनेमा जगत की यह आम समस्या है. सिनेमा जगत के रुपहले परदे पर अपनी भाग्य आजमाने वाले या मुनाफ़ा कमाने वाले लोग कभी-कभी डालर-सिनेमा, यूरो सिनेमा, दीनार सिनेमा या अन्य दुनिया की करेंसी से जुड़े सिनेमा में अपनी अस्मिता और भविष्य खोजते हैं तो खोजने दीजिये उनसे कोई शिकायत करने की ज़रुरत नहीं है. लेकिन इससे जो समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं या होने वाली हैं उससे चिंता स्वाभाविक भी है. वस्तुतः उदारवादी पूँजी और आवारा पूँजी के जरिये सांस्कृतिक क्षरण होता है सिनेमा सांस्कृतिक सन्देश देने की जगह कुछ और ही टेस्ट देने लगता है और यह सिनेमा के वास्तविक सौन्दर्यबोध के लिए खतरा है.
ग्लोबल, डायस्पोरिक व ट्रांसनेशनल फिल्मों के स्वागत के पीछे आर्थिक मुनाफ़ा केवल  नहीं हैं बल्कि यह एक तरह का अप्रवाशी लोगों के जुटाए गए पैसों पर नज़र है. भारतीय परिक्षेत्र में तथाकथित निपट गवांर लोगों से सिनेमा निर्माताओं का मोह भंग होने के बाद अब यह भी देखा जा रहा है कि उनका मोह उस दीर्घवर्ती मुनाफ़ा देने वाली दुनिया से भी भंग होने लगा है क्योंकि शायद मन माफिक भविष्य और लाभ इसमें नहीं मिलने के आसार उन्हें साफ़ नज़र आने लगे हैं. इस प्रकार सिनेमा का यह द्वंद्व सिनेमा से जुड़े लोगों के लिए खुद मृग-मरीचिका की तरह महसूस होने लगा है. ऐसे में, सिनेमा में अब ज्यादातर शोध और अध्ययन के बाद कार्य नहीं हो रहे हैं यह भी चिंता की बात है. 
क्या है फिल्मों का अर्थशास्त्र

हाल के वर्षों में बनी फिल्मों का यहाँ मैं कुछ ज़िक्र करना चाहूंगा. आपको याद होगा अवतार एक फिल्म अभी आई थी जिसे सताईस भाषाओं में प्रदर्शित किया गया था. यह फिल्म सात बिलियन यूएस डालर वैश्विक लेबल पर कमाई की. इसमें सबसे मजेदार बात यह है कि यह फिल्म सताईस भाषाओं में ज़रूर रिलीज़ हुई लेकिन इसमें से एक तिहाई भाषा केवल अमेरिकन भाषा थी. भारतीय भाषाओं में बनने वाली फ़िल्में और अन्य देशों की भाषाओं में बनने वाली (डब) फिल्मों के अर्थशास्त्र को इससे जोड़कर देखा जा सकता है. इसके साथ थ्री इडियट, रा-वन और कुछ अन्य फिल्मों का नाम यहाँ मैं लेना चाहूंगा पान सिंह तोमर, द डर्टी पिक्चर, कहानी, विक्की डोनर, आई एम् कलाम, स्टैनली का ढाबा, तारे ज़मी पर, रावड़ी राठौर ये सब फ़िल्में आईं लेकिन सबके मार्केट वैल्यूज काफी अलग-अलग आपको मिलेंगे. यह होता है सिनेमा और सिनेमा अर्थशास्त्र. भूमंडलीकरण के बाद सिनेमा का अर्थशास्त्र अब बदल गया है और सिनेमा के भाषाई, सांस्कृतिक एवं जनवादी चेतना पूरी तरह से अर्थ-केन्द्रित हो गयी है सामाजिक सरोकार भी अब द्रव्य से सिनेमा में तय किये जा रहे हैं इससे सिनेमा की संवेदना स्वयं में प्रश्नांकित  होने  लगी है. 
मूल संवेदना से भटका सिनेमा जगत

समय के मुताबिक़ सिनेमा ने अपना स्वरुप ज़रूर बदला लेकिन उसमें अब भी अहिंसक सिनेमा निर्माण की कृपणता मौजूद है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता. आप पूरे सिनेमा के सौ वर्ष पर नज़र दौडाएं तो यह लगता है कि सिनेमा ने सांस्कृतिक सद्भाव, सामाजिक प्रेम और सांस्कृतिक चेतना के लिए बहुत से फिल्मों का निर्माण किया लेकिन उसमें बहुतायत सिनेमा केवल हिंसा, अपराध, अराजकता, पर्याप्त मारधाड़ से पटा पड़ा मिलेगा. अहिंसक सिनेमा का जहाँ तक सवाल है तो इसे प्रायः बुद्ध या गांधी से जोड़कर देखा जाता है. हिंदुस्तान में सिनेमा का जन्म 1913 में हुआ और दक्षिण अफ्रीका से महात्मा गाँधी 1914 में भारत आए यह हम सभी जानते हैं. उनका प्रभाव प्रायः सभी क्षेत्रों और विधाओं पर पड़ा, यह भी सच है. शायद इसी कारण पहले चार दशक तक खलनायक बर्बर व क्रूर नहीं थे और उनके चरित्र भी गोलमोल थे. उस दौर में प्रेम या अच्छाई का विरोध करने वाले सामाजिक कुप्रथाओं और अंध विश्वास से ग्रसित लोग ज़रूर थे. ‘अछूत कन्या’, ‘सद्गति’, ‘सुजाता’, ‘नज़मा’ ‘दुनिया ना माने’,  ‘मिल’, ‘महात्मा’ (जो अंग्रेजों ने बाद में ‘धर्मात्मा’ में तब्दील कर दी) और ‘अमृत मंथन’ इन फिल्मों को गांधी या गांधीवाद से जोड़कर देखा जाता है सिनेमा में अस्पृश्यता, शराबबंदी और अन्य सामाजिक सरोकार को प्रमुखता मिली लेकिन इसके बरक्स हम अगर खलनायक या  एंटी नायक छवि वाली फ़िल्में जैसे शशिधर मुखर्जी की 1943 में प्रदर्शित ‘क़िस्मत’ में अपराधी का पात्र ही नायक रहा क्योंकि अशोक कुमार उसके लीद रोल में थे. इस विधा का भरपूर विकास 30 वर्ष बाद अमिताभ बच्चन द्वारा अभिनीत फ़िल्मों में ज्यादा मिलता है. आप टीनू आनंद की ‘शहंशाह’ देखें. इसके बाद शाहरुख खान अभिनीत ‘बाजीगर’, ‘डर’ और ‘डॉन’ में अपराधी ही नायक है. ये सिनेमा के साथ विडम्बना ही है कि सिनेमा एंटी नायक से ज्यादा चर्चित हुआ और वह अपने दर्शकों के दिल में जगह बना लिया.

सआदत हसन मंटो द्वारा लिखी गई ‘किसान हत्या’, मेहबूब खान की ‘औरत’, ‘मदर इंडिया’, दोस्तोविस्की के उपन्यास ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ से प्रेरित रमेश सहगल की ‘फिर सुबह होगी’, राजकपूर की ‘आवारा’, रमेश सिप्पी की ‘शोले’ राजकपूर की ‘श्री 420’ और ‘गुरू’ जैसी फिल्मों पर आप नज़र डालें इसमें ऐसे चरित्र मिलेंगे जो सिनेमा के इतिहास में किसी ख़ास मकशद को पूरा करने वाले करेक्टर हैं लेकिन यह किसी भी दशा में अहिंसक सिनेमा की अभिव्यक्ति नहीं हैं. गांधी को केंद्र में रखकर बनी फ़िल्में भी जिसमें ‘नाइन आवर्स टू राम’, ‘द मेकिंग ऑफ महात्मा’, ‘गांधी बनाम गांधी’, ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’, ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ और ‘गांधी इज माई फ़ादर’, इन फिल्मों को आप देखिये तो इस प्रकार आपके कई भ्रम दूर हो जायेंगे कि अहिंसक सिनेमा कितने स्तर पर समाज का हिस्सा बन सका और किस स्तर पर यह मैसेज लोगों को दे सका. गांधीगिरी को भी अगर पेश किया गया तो वह कहीं न कहीं मज़ाक बन गया लेकिन फिर भी लगे रहो मुना भाई जैसी फ़िल्में लोगों में एक नए जोश को पैदा करने में कामयाब रहीं.

सब मिलाकर अब तो फ़िल्में कसाब और अफ़ज़ल गुरु को केंद्र में रखकर बनेगी. आपको याद होगा कि शहर श्रीप्रकाश शुक्ला पर बनी थी और ऐसे बहुत से करेक्टर हैं जो सिनेमा में अपनी जगह देर-सबेर बनायेंगे लेकिन हम समाज को क्या परोसना चाहते हैं यह मायने रखता है. इसके पीछे हमें दो कारण दिखाई देते हैं. एक, या तो सिनेमा के पास कोई मैसिव-कहानी नहीं है या दूसरा, सिनेमा को अब इसमें अपनी मार्केट दिख रही है.
चाहे जो भी हो सिनेमा अब जिस जोर आजमाईस में है उसमें उसका केवल सांस्कृतिक पतन है क्योंकि सामाजिक मूल्यों और नैतिक समाज निर्माण वाले सिनेमा की जगह यदि ............शीला की जवानी और मुन्नी बदनाम हुई या जिलेबी बाई ......आदि आयटम सांग और खलनायकों को केंद्र में रखकर सिनेमा लेगा तो उससे हम किसी अच्छे भविष्य की कल्पना नहीं कर सकते. इससे निजात पाने के लिए केवल गांधीवाद की ओर लौटने की बात मैं नहीं करता लेकिन पर्यावरण, भूख और सामाजिक समरसता के लिए रचा-बुना और फिल्माया सिनेमा ही समाज के मुख्यधारा का सिनेमा है, इसे स्वीकार एक दिन स्वीकार करना पड़ेगा.

और अंत में,

सिनेमा अपने उत्स की ओर है और उसके उत्कर्ष की कथा केवल साहित्य दे सकता है. सिनेमा के पितृसतात्मक सोच और बाज़ार के मोह से अलग करने की जिम्मेदारी साहित्य ही दे सकता है. सिनेमा और साहित्य का चोली दामन का सम्बन्ध रहा है. अच्छे लेखक, अच्छे संगीत, अच्छे सिनेमोटोग्राफ़ी, अच्छी थीम, वाजिब व जरूरत की संवेदना और सांस्कृतिक उठान के लिए अच्छे प्रयास सिनेमा को नए आयाम देंगे लेकिन यह तभी संभव है जब सिनेमा और साहित्य समाज साथ चलकर प्रयास करेंगे वरना ओम पूरी और शेखर कपूर जैसे बड़े अभिनेता, निर्देशक कि निराशा के साथ अरबों के संख्या में सिनेमा प्रेमी भी निराश होंगे.

Thursday, 7 February 2013


  आध्यात्मिक मीडिया का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण : श्रीमद्भागवतगीता
डॉ. कन्हैया त्रिपाठी
मीडिया विमर्श की जब हम बात करते हैं तो हमारे समक्ष ऐसे कई माध्यमों की छवि प्रकट होती है. इसमें हम प्रकृति को मीडिया नहीं मानते. इसमें हम किसी पराशक्ति को भी हम मीडिया नहीं मानते. अब भी यही माना जा रहा है कि पहले जब मनुष्य अपने चेतन अवस्था में आया होगा तो उसने मीडिया को किन अर्थों में लिया होगा इसकी कल्पना मात्र लोग कर सकते हैं उसका सही स्वरुप नहीं व्यक्त कर सकते. हाँ, यह ज़रूर कहा जा सकता है कि निरंतर चेतना के विकसित होने की प्रक्रिया में मनुष्य अपने आध्यात्मिकता को मीडिया मानता होगा. वह पेड़-पौधों, गुफाओं, कंदराओं और जंगलों में प्रकृति से जरूर संवाद स्थापित करता होगा. लिपि के विकास से पहले यह कहा जाता है कि ध्वनि उच्चारित हुई होगी. और शायद, विकास की प्रक्रिया में यही ध्वनि उसकी आध्यात्मिकता की ताकत भी बनी हो और मनुष्य का प्रकृति से संवाद के साथ ईश्वर जैसी अवधारणा से संवाद हुआ हो. फिलहाल, यह केवल कल्पना मात्र है लेकिन आज मीडिया का सशक्त स्तम्भ के रूप में पूरे विश्व में प्रतिनिधित्व है यह एक बड़ा सच है. यहाँ तक कि अब जो क्रान्ति के सार्थत्व का जिम्मा है वह मीडिया के माध्यम से संभव है और गीता को पढ़ने वाले इसे श्रीकृष्ण के रूप में देख रहे हैं. यह बात अलग है कि इस श्रीकृष्ण पर पूर्ण भरोसा अभी तलक बन नहीं सका है. जो भी हो, इस श्रीकृष्ण का भले ही पूर्ण भरोसा न बन पाया हो लेकिन श्रीकृष्ण द्वारा स्वयं उदघोषित गीता को आध्यात्मिक जगत के लोग और मनुष्यता में विश्वास करने वाले लोग आशा भरी निगाह से देख रहे हैं.
  वस्तुतः, पवित्र गीता अद्भुत रसास्वादन और अनुभूति की महान पुस्तक है. पुस्तक का अर्थ है माध्यम का एक मॉडल. पुस्तक को मीडिया विशेषज्ञ प्रिंट मीडिया के रूप में परिभाषित करते हैं. आज सूक्ष्म और स्थूल का विश्लेषण करने के लिए पूरे विश्व के लोग बिना गीता के अध्ययन, मनन, चिंतन और आत्मसातीकरण के अपने विश्लेषण, ज्ञान और विज्ञान को विल्कुल अधूरा मानते हैं. ईश्वर द्वारा स्वयं ध्वनित सूत्र जिससे जीवन और जगत का ज्ञान संभव हो जाता है इससे भला कोई बिना परिचित हुए कैसे रह सकता है.
गीता से पूरी तरह परिचित हो पाना बहुत ही कठिन यत्न है. यह पूरे मनोयोग और साधना के भी बाद इतने विकल्पों, मार्गों, और संभावनाओं को प्रकट करती है और मनुष्य को यह महसूस कराती है कि अभी भी हम गीता को एक बार पुनः पढ़ लें तो शायद कुछ और नया सूत्र मिल जाए. इसीलिए इसके टीकाकार इसके अध्ययन के पश्चात जितनी बार व्याख्या, विश्लेषण या टीका करने का प्रयास किये उन सबके मत अलग-अलग हमें मिलते हैं. यद्यपि सभी विद्वानों के अनुसार इस पूरे गीता में वही अट्ठारह अध्याय हैं जिसमें श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उन उपदेशों से अभिसींचित किया है जिसके अभाव में अर्जुन अपने कर्त्तव्य से विमुख हो रहे थे. धर्मच्युत हो रहे थे.
मीडिया के यदि सामान्य दायित्व पर हम बात करें, तो उसका कार्य है समाज का तटस्थ होकर मार्ग-प्रशस्त करना और किसी भी अतिक्रमण के खिलाफ आवाज़ बुलंद करना है. इस कर्त्तव्य को गीता में कर्मयोग की संज्ञा दी गयी है क्योंकि यदि मीडिया ऐसा करे तो यह उसका कर्त्तव्यबोध है. मीडिया का यह भी कर्त्तव्य है कि वह समदृष्टिगत विचार रखे, समभाव और सम्यक आदर्श को प्रस्तुत करे. गीता की जब भी रचना हुई उसमें इन सबकी ओर गंभीर ध्यान था या नहीं लेकिन इस बात पर जोर था की मनुष्य का मूल्यबोध, कर्त्तव्यबोध और निर्णय लेने की क्षमता की निर्मिति हो सके.
महात्मा गाँधी ने यंग इंडिया में सन 1925 में लिखा, ‘यह प्रसिद्ध गीताशास्त्र सम्पूर्ण वैदिक शिक्षाओं के तत्वार्थ का सार-संग्रह है. इसकी शिक्षाओं का ज्ञान सब मानवीय महत्त्वाकांक्षाओं की सिद्धि कराने वाला है. (द्रष्टव्य: भगवद्गीता/ डॉ. सर्वपल्ली राधा कृष्णन/हिंदी पाकेट बुक्स, नई दिल्ली-२/२००४ पृष्ठ १२)’. इस बात की पुष्टि भगवदगीता पर शंकराचार्य द्वारा की गयी टीका में है. शंकराचार्य ने लिखा है-‘समस्तवेदार्थसारसंग्रहभूतम् समस्तपुरुषार्थसिद्धिम’ जो कि गीता के बारे में ही लिखा गया है.
इस प्रकार गीता के तात्त्विक स्वरुप को हम बहुत ही गंभीरता से देखते हुए यह कह सकते हैं कि गीता एक सभ्यता का उदघोष है जिसमें व्यापक शान्ति, सत्य और तात्विक समाज का बीजारोपण है. एक ऐसे तत्त्व का बीजारोपण जिसमें मनुष्य के उत्थान एवं उत्कर्ष की संकल्पना है. सच्चे अर्थों में अगर हम बात करें तो यह एक प्रकार की मूल्यानुगत मनुष्य-समाज के स्थापना का प्रयास गीता द्वारा किया गया है. मूल्यानुगत मनुष्य-समाज का निर्माण मनुष्य के कर्मबोध की पराकाष्ठा द्वारा ही संभव होता है. गीता में उस संभावना का अद्भुत संकल्प है.
 अब संकट इस बात का है कि गीता को हम मीडिया विमर्श के साथ कैसे पढ़ें या उसको कैसे समझें? गीता को हम एक स्थापित मीडिया के रूप में कैसे मान सकते हैं? यद्यपि यह आध्यात्मिक पुस्तक है जो ईश्वर को सर्वव्यापी, संप्रभु, सर्वोत्तम और सब कुछ मानने पर विवश करती है. ऐसे में एक प्रश्न यह भी है कि उन अनीश्वरवादियों का क्या होगा जो किसी भी सत्ता को मानने से इनकार करते हैं.....मीडिया के इन प्रश्नों का भी उत्तर गीता में उपलब्ध है. शिक्षाओं के तत्वार्थ का सार-संग्रह, इसका तात्पर्य ही हुआ कि इसमें वे उत्तर भी समादृत हैं जो हमारे मन को कौंध रहे हैं या अनुत्तरित हैं.
मीडिया और मीडिया के विविध स्वरूपों में आज जिस प्रकार की होड़ मची हुई है वह किसी से छुपा नहीं है. मीडिया के वाह्य और आतंरिक सौन्दर्य को इसके लिए हमें अलग-अलग करके विश्लेषण करना पड़ेगा. आतंरिक में भी सूक्ष्म का सौन्दर्य की जिज्ञासा ही हमको गीता के मूल संवेदना से परिचित करा सकती है. उसको अगर हम बहुत ही साधारण तरीके से देखने का प्रयास करेंगे तो भी गीता के मीडिया-स्वरुप और संवेदना से वंचित रह जायेंगे. यह इसलिए भी क्योंकि गीता कोई सामान्य पुस्तक नहीं है वह ब्रह्म का ही एक रूप है. जयराम वी ने एक गीता पर अपना सार प्रस्तुत करते हुए लिखा है-“According to the Bhagvadgita a man should not renounce action or avoid his obligatory duty. He Should engaging himself in action, but with a sense of detachment, with a steady mind and with self-discipline, casting away egoism and all other negative qualities, without any desire for the fruits of his actions, with sense of sacrifice, completely surrendering to the God and fully devoted to him, offering the fruit of his actions to Him and partaking the remains of the nectar in the form of sacrifice.”(http://www.hinduwebsite.com/gitaindex.asp ). इसलिए गीता से जुड़े मीडिया प्रश्नों का संरचनात्मक विवेचना मीडिया में हो रहे बहस के साथ जब जोड़कर हम करेंगे तो एक-एक सूत्र खुलते नज़र आयेंगे. और यह बिना गीता के दर्शन और मीडिया के दर्शन को साथ-साथ देखे संभव नहीं है.
मीडिया का दर्शन सत्य से अलग नहीं है. उसी प्रकार गीता का दर्शन सत्य की स्थापना है. गीता इसी सत्य के सौन्दर्य को मनुष्य मात्र के सौन्दर्य से जोड़कर देखने वाली ज्ञान की कुंजी है. अब समस्या यहाँ यह आती है कि गीता को भी आलोचक एक इतिहास का आख्यान मान बैठते हैं प्रायः यह दलील दी जाती है और सचाई भी है कि इतिहास समस्याओं के पिटारे हैं. इसलिए आज के मीडिया विमर्श में जब हम इतिहास के रूप में गीता नहीं लें तो गीता एक ज्ञान-मीमांशा की नवोन्मेषी पद्धति निर्मित करने वाली पुस्तक के रूप में अनुभूत होगी जिसमें सत्य और धर्म के पाठ हैं. इस तरह गीता का संवाद मनुष्यता के दीर्घवर्ती भविष्य का शुभ संकेत प्रतीत होगा. मीडिया इसी दीर्घकारी मनुष्य समाज के बने रहने या अस्तित्व कायम रहने के कोशिश में है इस प्रकार हम हम पायेंगे कि मीडिया और गीता दोनों किसी स्तर पर एक ही उद्देश्य के लिए सतत प्रयास करते हुए मिलेंगे.
ऑक्सफ़ोर्ड बिब्लियोग्राफी में उद्धृत है- The Bhagavad Gita is one of the supreme works of Sanskrit and indeed of all world literature. लेकिन संस्कृत के इस महान साहित्य को मीडिया की गहराइयों और उसके अनुशासन को व्यक्ति-मनुष्य के निजी जीवन के रूप में गीता ने प्रकट किया है इसलिए इसकी प्रासंगिकता काफी समय से ढूढी जा रही है. फिलहाल, मैं गीता के सार्थक शब्दों को लोककल्याण के रूप में पाता हूँ जिसकी खोज में मीडिया नित्य प्रयासरत है. मैं इसे निहायत धार्मिक पुस्तक के रूप में देखने वालों से क्षमा माँगते हुए यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि यह एक सारगर्भित जीवन-जगत के अंतर को स्पष्ट करने वाली पुस्तक तो है ही साथ ही नैतिक और मूल्यगत मीडिया है जिसका प्रभाव सतत समाज निर्माण में हमेशा बने रहने वाला है. मीडिया के इस मूल्यगत अभिव्यक्ति को पृथक-पृथक तरीके से देखने की ज़रुरत है. आध्यात्मिक मीडिया के तात्विक विश्लेषण के बाद गीता के मीडिया फिलॉस्फिकल अप्रोच को हम समझ सकेंगे जो कि लम्बे विमर्श का हिस्सा है जैसे मनुष्य को मिथ और सत्य से रू-ब-रू होने के बाद उसके भ्रम दूर होते हैं उस प्रकार गीता कैसे एक आध्यात्मिक मीडिया है इसकी अनुभूति हम कर सकेंगे.
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Tuesday, 8 January 2013


नये वर्ष के संकल्प पर टिके हमारे भविष्य
/डॉ. कन्हैया त्रिपाठी 
हम अब 2012 को अलबिदा कहकर 2013 में प्रवेश कर रहे हैं तो बीती बातें हमारे मन और मस्तिष्क को कुछ अलग ही तरह से रोमांचित कर रही हैं. सब मिलाकर कहा जाए तो पिछला पूरा वर्ष भारत के उपलब्धि के लिए कुछ ख़ास नहीं रहा. हाँ, एक बात ज़रूर हुई है कि हमें कुछ ऐसे सूत्र पिछले वर्ष ने जरूर दिया जिससे हम अपने भविष्य को बेहतर बनाने में मदद ले सकते हैं. भारत के जंतर-मंतर पर 29-30 तारीख को मोमबत्तियां अखंड रूप से जल रही हैं, यह क्यों जल रही हैं पूरे देश को पता है. अब अगर बीते वर्ष की हम बात करें तो वर्ष के शुरुआत में हम देखेंगे कि अन्ना और केजरीवाल का आन्दोलन शिखर छू रहा था तो वहीँ सरकार कुछ ऐसे पसोपेश में थी कि हम महंगाई की मार से आम आदमी को कैसे बचाएं. यद्यपि सरकार के इसमें कोई ज्यादा दोष नहीं रहे. बल्कि यह लगता है कि भारत ही नहीं पूरी दुनिया ही आर्थिक मार से अपने यहाँ के मनुष्यों को यह साहस बधाने का कार्य कर रही थी. हाँ, अन्ना के अनुसार जन लोकपाल नहीं बन पाया. इससे आम आदमी में निराशा दिखी. इसके भावी समय में फायदे का अंदाजा लगाया जा सकेगा कि जन लोकपाल का न बनना सरकार के या आमजन के, किसके हित में रहा.
अभी हाल ही में देश के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने राष्ट्रीय विकास परिषद् के उदघाटन एवं समापन सत्र को संबोधित किया और इसमें कुल मिलाकर उनका यह कहना था कि कुछ चुनौतियाँ हमारे समक्ष खड़ी हैं और यह हम सबकी सामूहिक साझेदारी से यह दूर होंगी. उन्होंने जो दो-तीन मुख्य मुद्दे  को उठाया उसमें देश की विकास दर आठ प्रतिशत तक पहुंचाने और महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर होने का संकल्प था. इसके दो वजहें थीं. पहला यह कि पूरे वर्ष हम अपनी विकास दर नौ प्रतिशत करने के लिए जूझते रहे वह एक सपना था. वह पूरा नहीं हुआ. दूसरे वर्ष के जाते-जाते एक तेईस वर्ष की युवती के साथ क्रूर तरीके से बलात्कार हुआ. फिलहाल, जो विकास दर हम नौ प्रतिशत पहुंचाने की बात सोच रहे थे वह वक़्त के साथ आठ प्रतिशत के लक्ष्य पर रुक गयी है और यदि इतने बड़े पैमाने पर उस युवती के साथ वीभत्स बलात्कार मामले को मीडिया और आम आदमी आन्दोलन का रूप न दिया होता तो सामान्य तरीके से शायद मल परिषद् में चुनाव 2014 पर बातें होतीं.
खैर, समय के मुताबिक़ चुनाव पर नहीं बात करना प्रधान मंत्री जी की बुद्धिमानी है. लेकिन समावेशी समाज के विकास के लिए यह समझ में  नहीं आता कि योजनाकार हमारे आम जनमानस के लिए क्यों नहीं हमेशा चिंतित रहते हैं. हमारे देश के आधी आबादी को सुरक्षा नहीं है. गरीबी पर बहुत ज्यादा अंकुश नहीं लग पाया है. महंगाई अपने चरम पर है. सब्सिडी की कटौती से किसान और हासिये का जनजीवन गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है. देश में तमाम तरह की बीमारियों और मल्टीनेशनल के दुकानदार से खाली हो रहे जेब दो जून के भोजन के लिए बेहाल होने के कगार पर है. ऐसे में, हम किस चौराहे पर खड़े हैं यह सोचने वाली बात है. सरकार ने एफडीआई को पास कर दिया और अब विदेशी लोग हमारे यहाँ खुदरा व्यापर कर सकते हैं. हमने एक कसाब को फ़ासी लगा दी उसके कारण तो आतंकवाद से हम जंग में विजयी होने का जश्न मना लें लेकिन विदेशी और मल्टीनेशनल के हांथों हमारी जो रोज हत्या हो सकती है वह खुली, यह हमारे लिए कितना उचित है कितना अनुचित यह बात एक बड़े विमर्श के लिए आमंत्रण  है.
प्रधान मंत्री जी ने एक और जल संसाधन परिषद् में कुछ अपने मंतव्य व्यक्त किये हैं. उन्होंने इस परिषद् को संबोधित करते हुए यह कहा है कि जैसा कि हम बारहवीं पंचवर्षीय योजना में हैं और भारती अर्थव्यवस्था तथा समाज को जल क्षेत्र में मात्रा और गुणवत्ता दोनों के सन्दर्भ में कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. इसलिए तत्काल और व्यावहारिक निर्णयों की जरूरत है. क्योंकि जल सुरक्षा एक ऐसा मुद्दा है जहाँ हमें एक साथ तैरना है या एक साथ डूबना है. इन निर्णयों पर आपके सामूहिक समर्थन की जरूरत है. जल, जंगल, जमीन और जनमानस सभी के लिए प्रधान मंत्री चिंतित हों या न हों लेकिन कहीं न कहीं यह उनके भाषणों में जो चिंता आ रही है वह हमारे भविष्य की बुनियादी जरूरतों के कारण है और प्रधान मंत्री के लिए चुनौती है.
इन चुनौतियों के बीच पार्टियों से छूटटा आम मतदाता और सरकार से मुक्त होती जनता की जुबान कुछ नए इशारे कर रहे हैं. इसे अब सबको समझ लेना चाहिए. मलाला और दामिनी दो लड़कियों ने हम सबको एक बार अपनी ओर हमारा ध्यान खींचा है. महिलाओं के सुरक्षा, उनकी गरिमा और उनका स्वत्व से होता खिलवाड़ पूरे एशिया में अब एक नए तरह के आक्रोश की तरह उभरा है.
किसी की भी स्वाधीनता और उसके सम्मान बहुत मायने रखते हैं. बलात्कार पर कमेटियों का गठन और जांच भले हो जाए लेकिन जो कायदे से सरकार को कदम उठाने चाहिए वह है नैतिक मूल्यों से दूर होती जनता को पुनः मुख्यधारा में वापस लाना. यह सरकार को देर सबेर लाना ही पड़ेगा वरना कानूनों से देश में न ही कोई सम्मान बढेगा न ही किसी की सुरक्षा.
सम्मान के अतिरिक्त भी हमारी सबकी जिम्मेवारियां जो पर्यावरण, विकास और मूल्यों के संरक्षा के लिए है उसे भी आम जनता को नए वर्ष में नए संकल्प के साथ दुहराना होगा वरना इसमें कोई शक नहीं है कि हम पुनः उसी गलतियों के शिकार हों जिससे गए वर्ष में जूझते रहे हैं. भारतीय संस्कृति और सभ्यता अब इतनी मैली हो गयी है कि आज हमारे फेस बुक, ट्यूटर और अन्य न्यू मीडिया के माध्यम से हम शर्मिन्दित हैं. और कुछ ऐसा ही लिखकर अफसोस जाहिर कर रहे हैं. इससे मुक्ति सबके साथ-साथ संकल्प लेने से होगा और उस दिशा में दो कदम आगे बढ़ने से होगा. हमारे अपने सम्मान जब तक सुरक्षित नहीं हैं हम किसी भी उस मनोदशा को नहीं प्राप्त कर सकते जिससे हमारा विकास और उत्कर्ष होना है और हमारे मानव विकास सूचकांक में इजाफा होना है. शायद हम नए वर्ष में इन चुनौतियों को स्वीकार कर पुनः उन गलतियों को करने से बचें तो जरूर हम एक सही लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे. लेकिन जहाँ चुनौतियां हैं वहीँ हमारे पास संभावनाएं हैं आवश्यकता इस बात की है कि हम सही रास्ते पर जल्दी चलना शुरू कर दें और अपने मन में दया, प्रेम, करुणा एवं सह-अस्तित्व की मोमबत्तियां जलाएं.
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पता: डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, (पूर्व राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटील के सम्पादक), सहायक प्रोफ़ेसर, अकादमिक स्टाफ कालेज, डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश), Mo: 08989154081, email: kanhaiyatripathi@yahoo.co.in, hundswaraj2009@gmail.com 

चिंतकों का सौन्दर्यबोध
डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

भारत समेत दुनिया के लोग अपने-अपने ढंग से जीते हैं. उनके जीने की कला खुद की एक दुनिया को परिभाषित करती है. वास्तव में उनके जीने की पद्धति ही खुद में उनका सौन्दर्यबोध और मूल्यबोध की तरह होता है. सुन्दर होने के लिए दैहिक सौन्दर्य की आवश्यकता नहीं होती बल्कि सौन्दर्यशास्त्री ये कहते हैं की सुन्दर का सौन्दर्यबोध मूल्यगत होता है. इसका प्रमाण हमें हाल ही में प्रकाशित हुई अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका फारेन पॉलिसी में देखने को मिलता है. इसमें जिन सौ चिन्तक लोगों का नाम दर्शाया गया है वह लोग दुनिया को अभिव्यक्त करते हैं. इसमें आंग सांग सू ची को पहला स्थान पत्रिका ने दिया  है. हम सभी जानते हैं कि सू ची एक ऐसी महिला हैं जो लोकतंत्र के लिए वर्मा (म्यांमार) में वर्षों से जेल में रहीं और उन्होंने कभी भी अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया. छठें स्थान पर मलाला को जगह दी गयी है और दुनिया के सबसे ताकतवर बराक ओबामा उसके बाद इस पत्रिका में स्थान पाए हैं. मलाला वह लड़की है जो महिलाओं के शिक्षा के लिए उन कट्टर लोगों से जंग की और उसके लिए उसे अपने जीवन और मौत के बीच भी संघर्ष करना पड़ा.
दरअसल, इन चिंतकों में अपने-अपने अनुसार लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, मनुष्य की गरिमा, उनके आर्थिक समृद्धता, सामाजिक समरसता और सद्भावना की कोशिश करने वालों को स्थान मिला है. उन्हें स्थान मिला है जो समय को प्रभावित करने वालों में सुमार किये जा रहे हैं. और यह कहना गलत न होगा की इन सभी ने अक तरह से मूल्यों को स्थापित किया है. मूल्यों के साथ जीवन जीना, जीवन के साथ मूल्य को सतत बनाए रखना बहुत आसान नहीं है. और यह कम लोगों में माद्दा होता है की वह अपने जीवन में भौतिकवादी सोच और सुख से मुक्ति लेकर दूसरों के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तत्पर हों. सू ची, थिएन सीइन, मोंकेफ़ मर्ज़ुकी, बिल क्लिंटन, हिलेरी क्लिंटन, सेबास्तिएन थरुन, बिल गेट्स, मिलिंडा गेट्स, मलाला यौसफ्जई, बराक ओबामा, पॉल रयान, चेन गंग्चेंग, डेविड ब्लान्केनहॉर्न, नारायण कोचेर्लाकोटा और  रिचर्ड अ मूलर ये कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें पत्रिका ने प्रथम दस शीर्ष चिंतकों में शामिल किया है. हो सकता है की यह आम सहमति का मुद्दा नहीं हो और पत्रिका की राय मानी जाय लेकिन सू ची और मलाला के नाम पर कोई संदेह किसी को नहीं हो सकता. एक दिलचस्प बात यह है की भारत के बिहार प्रांत के मुख्य मंत्री नितीश कुमार को सत्रहवें और रघुराम राजन को अस्सीवें स्थान पर सामाजिक उन्नति के सन्दर्भ में याद किया गया है. सोच का अभिविन्यास कुछ भी बने लेकिन अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका फारेन पॉलिसी का यह सौ लोगों का दुनिया अपने अनुसार संपादित करने और कुछ कर गुजरने वाले लोगों का सम्मान है. यह एक तरह से उनके सौन्दर्य का प्रकाशन है. प्रायः अपने तक लोगों की बनती सोच, लूट कर धनी बन जाने की प्रवृति रखने वाले लोगों के लिए सीख है.


आम आदमी की लोकतंत्र से बढ़ती निराशा?
          डॉ. कन्हैया त्रिपाठी
किसी भी राष्ट्र का लोकतंत्र उसकी गरिमा को न सिर्फ अभिव्यक्त करता है बल्कि उसकी संप्रभुता को सुदृढ़ भी बनाता है. भारत में इस बात की काफी नजीर दी जाती रही है कि हमारे देश का लोकतंत्र अन्य पड़ोसी देशों की अपेक्षा टिकाऊ है. यह बात शत-प्रतिशत सच हो भले लेकिन जिस प्रकार हमारे भ्रम टूटते जा रहे हैं पिछले कुछेक वर्षों में, इससे इस बात का एहसास होता है कि हमारी भी स्थिति अब ठीक नहीं है. एशिया के बहुत से ऐसे देश हैं जो इस त्रासदी से गुजर रहे हैं. अभी पिछले दिनों मानवाधिकार दिवस पर संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने कहा कि मोटे तौर पर विश्व के अनेक हिस्सों में हमने लोकतांत्रिक प्रशासन में हासिल सफलताओं के लिए चिंताजनक खतरे देखे. कुछ देशों में सामाजिक समूह बढ़ते दबाव और पाबंदियों का सामना करते हैं. सामाजिक संगठनों को विशेष रूप से निशाना बनाकर क़ानून बनाए गए हैं. जिससे उनके लिए काम कर पाना असंभव हो गया है. लोकतंत्र का सामना नए टकराववादी उपायों से हो रहा है. हम सबको बिपथगामी प्रवृत्ति पर चिंतित होना चाहिए. बान की मून की यह एक तरह से आम आदमी की चिंता है. भारत में उभरता नक्सल और अन्य सरकार की नज़र में उसके मुताबिक़ काम न करने वाले लोगों के खिलाफ ऐसे क़ानून आहिस्ता-आहिस्ता चलन में आ जायेंगे. बान की मून की तरफ से की जा रही चिंता का आखिर कोई न कोई कारण है.
यहाँ मैं तीन दलीलों को एक-एक करके देख रहा हूँ. पहला, पिछले कई महीने अन्ना हजारे और अरविन्द केजरीवाल के आन्दोलन चले. इसमें आम आदमी सरीक हुआ. उसके मन मस्तिष्क में केवल एक भावना थी कि हमें भ्रष्टाचार से मुक्ति दिला दो. लेकिन उसके मांग के जो तरीके थे वह सरकार के भ्रष्टाचार मुक्ति के तरीकों से मेल नहीं खाते. सरकार अपने ढंग का भ्रष्टाचार मुक्ति क़ानून लाने के लिए प्रतिबद्ध है. आम आदमी का लोकतंत्र कुछ और है और सरकार के लोकतंत्र की परिभाषा उसकी स्थायित्व से जुड़ी है. यह जो एक-दूसरे के बीच खाइयां हैं उसे न ही सरकार पाट पा रही है न आम आदमी अब यह समझ पा रहा है कि उसकी सीमाएं कहाँ पर ख़त्म हो जाती हैं.
दूसरा, एफ.डी.आई को लेकर कुछ रोष हुआ. आम लोगों को इसमें मुक्ति के लिए शामिल किया गया और आवाज़ उठाने की बात हुई. उसके भी सामने अलग-अलग पार्टियों के लोगों ने अपने हथियार डाल दिए. आम आदमी जहाँ का तहां केवल तमाशबीन बनकर देखता रह गया. उसे न ही माया का साथ मिला न ही मुलायम सिंह यादव का कोई न्याय. अपने-अपने लोकतंत्र गढ़ने की यह कोशिश थी और किस तरह आम लोगों के खुशियों से दो-चार हो कर उनसे दूर निकल गयी इसका लोगों को भान भी न हो सका.
तीसरा, जो आजकल दिल्ली समेत भारत भर में हो रहा है. बलात्कार के सम्बन्ध में आन्दोलन हो रहा है. उसे सुनकर तो यही समझ में आता है कि भारत की जनता खासकर बेटियाँ कितनी असुरक्षित हैं. इस बलात्कार पर भी आन्दोलन हो रहा है यह ठीक है. यह रूह से निकल कर लोगों की निकली आवाज़ है. लेकिन आन्दोलन को सही न्याय देने की जगह जो बहस फांसी पर अटक रही है वह न ही बलात्कारियों को कोई सजा दिला सकेगी और न ही कोई पीड़ित को न्याय.
इस देश में बहस बहुत ज्यादा होती है. बहस से आप क्या जताना चाहते हैं? यही कि आप कितने तरह से विचार कर सकते हैं? कितने तरह से बचाव कर सकते हैं? कितने तरह से अपने गुबार को जनता के सामने लाने में आप प्रवीण हैं? शायद यह आपकी बहस किसी पीड़ित के घाव को कभी भर नहीं सकेगी, इसका आपको एहसास नहीं है. शायद इन बहसबीनों को यह पता नहीं है कि आप आम आदमी के निराशा को बढ़ाने के सिवा और कुछ भी नहीं कर रहे हैं? यह आम आदमी आज के लोकतंत्र से निराश है तो इसके लिए यह आपकी बहस कहीं न कहीं जिम्मेदार है.
असली इसकी लड़ाई यही है कि क़ानून इतने शख्त हों कि कोई ऐसी घृणित कोशिश करने के लिए दस बार सोचे. बजाय इस बात की चिंता करने की कि उसे फांसी दी जानी चाहिए या नहीं इस बात की चिंता ज्यादा होनी चाहिए की इस समस्या से मुक्ति के उपाय क्या हैं? लोकतंत्र में और लोकतांत्रिक देश भारत में रह रहा आदमी इस बात से हमेशा बेफिक्र होना चाहिए कि उसकी सुरक्षा कभी खतरे में है. उसकी सुरक्षा का जिम्मा तो राज्य की जिम्मेदारी है. लेकिन विडम्बना यही है कि वह अपनी औपचारिकताएं पूरी करता है. भारत के पूर्व मुख्य न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) श्री जे.एस. वर्मा की अध्यक्षता में एक समिति गृह मंत्रालय ने बनायी है. इस वर्मा समिति की अपेक्षा है कि आम आदमी अपना सुझाव दे और देश को एक क़ानून उस सुझाव के मुताबिक़ हम देंगे लेकिन क्या यह पर्याप्त है? अब यह सुझाव पांच जनवरी तक आयेंगे फिर बहस होगी और संस्तुति की जायेगी. इसके परिणाम क्या होंगे इसका मालिक खुदा है. फिलहाल संयुक्त राष्ट्र के महासचिव और देश के गृह मंत्रालय ने अपनी अपनी पूरी चिंता आम आदमी के सामने रख दी है अब न्याय मिले तो सरकार की और अपराध हुए तो भी वे जागरूक हैं.
फिलहाल, सरकार जो कर रही है उसे तो करने देना चाहिए लेकिन अपने ही समाज के अनैतिक साहस क्या इन साड़ी समस्याओं की जड़ नहीं लगते. शायद सामूहिक नैतिक भावना और मूल्यों के साथ संयम इन मुशीबतों से मुक्ति दिला सकते हैं लेकिन यदि समाज खुद जागरूक हो तभी यह संभव है.
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पता: डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, (पूर्व राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटील के सम्पादक), सहायक प्रोफ़ेसर, अकादमिक स्टाफ कालेज, डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश), Mo: 08989154081, email: kanhaiyatripathi@yahoo.co.in, hundswaraj2009@gmail.com

Tuesday, 7 June 2011

Istrivad ko peechhe chhodatin Mother Teresa

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मनुष्य का दायरा तब बढाता है जब हमारे बीच ऐसी सख्शियत मौजूद हो जाती हैं जो किसी भी तरह हमारे लिए प्रेरणास्रोत हों. मदर टेरेसा उनमें से एक थीं. वह किसी समाज से यह नहीं कहतीं कि स्त्रियों को अधिकार दो. वह स्वयं एक ऐसी मिसाल की तरह पेश होती हैं जिससे लोग उनके प्रेरणा पर अपनी राह बनाएँ. आज का स्त्रीवादी प्रश्न जो हर गली-चौराहे पर मुखरित हुआ है उसके लिए भी मदर एक ऐसी मिसाल हैं जो किसी पितृसत्तामक समाज से यह शिकवा नहीं करतीं कि वे हमें आगे बढ़ने से रोक रहे हैं.
सेवा भावना
मदर टेरेसा जी का 27 अगस्त 1910 को मैकेडोनिया गणराज्य की राजधानी स्कोप्ज में एक कृषक दंपत्ति के  घर जन्म हुआ था। क्या आप जानते हैं कि मदर टेरेसा का असली नाम 'अगनेस गोंजे बोयाजिजू' था? बचपन में ही अगनेस ने अपने पिता को खो दिया। बाद में उनका लालन-पालन उनकी माता ने किया।  महज एक जीवन नहीं मिशन मदर टेरेसा 18 वर्ष की छोटी उम्र में ही समाज सेवा में जुटीं। इसको अपना ध्येय बनाते हुए मिस्टरस ऑफ लॉरेंटो मिशन से स्वयं को जोड़ीं । वह सन् 1928 में रोमन कैथोलिक नन के रूप में कार्य शुरू कीं। भारत में वह बहुत दूर से आई थीं, मैसिडोनिया के स्कोप्जे शहर से। अलबेनियाई मूल की अट्ठारह साल की एक नन एगनस, यूं तो लॉरेटो कॉन्वेंट में पढ़ाने के लिए भारत पहुंची थीं लेकिन बीस साल बाद उसे समझ में आया कि उसकी दुनिया तो कहीं और बसती है. सड़कों पर, झुग्गियों में, गरीबों में, और लाचारों में ।
 ईसाइयों के सबसे बड़े चर्च वैटिकन ने उसे उसकी दुनिया दे दी. यह पहली और इकलौती मिसाल हैं, जब वैटिकन ने किसी नन को बंद कमरों से आज़ादी और बाहर रहने की इजाजत दी, उसे अपना अलग ऑर्डर शुरू करने की अनुमति दी । कहते हैं जहां चाह है वहीँ राह है, यह कहावत इस महिला ने चरितार्थ किया। दार्जिलिंग से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद मदर टेरेसा ने कलकत्ता का रुख किया।
24 मई, 1931 को कलकत्ता में मदर टेरेसा ने  'टेरेसा' के रूप में अपनी एक पहचान बनाईं। इसी के साथ ही उन्होंने पारंपरिक वस्त्रों को त्यागकर नीली किनारी वाली साड़ी त्यागने का फैसला किया। मदर टेरेसा ने कलकत्ता के लॉरेंटो कान्वेंट स्कूल में एक शिक्षक के रूप में बच्चों को शिक्षित करने का कार्य भी प्रारम्भ किया। मदर टेरेसा की जन्मशती पर डॉयचे ऑफ वेले-जर्मन  रेडियो से खास बातचीत में नवीन चावला ने कहा, “बीस साल तक लॉरेटो कॉन्वेंट में पढ़ाने के बाद उस महिला को समझ में आता है कि उसकी जिंदगी तो सड़कों और झुग्गियों के लिए लिखी है। यह पहला और इकलौता मामला रहा, जिसमें वेटिकन ने एक नन को नन रहते हुए सड़कों पर जाने की इजाजत दी। कोई साथी नहीं, कोई मददगार नहीं, कोई पैसा नहीं। उन्होंने अपने कार्य को पूरा किया। सिर्फ अकेले। उनकी जिन्दगी वास्तव में एक रहस्य थीA“
 सन् 1949 में मदर टेरेसा ने गरीब, असहाय व अस्वस्थ लोगों की मदद के लिए 'मिशनरीज ऑफ चैरिटी' की स्थापना की, जिसे 7 अक्टूबर 1950 में रोमन कैथोलिक चर्च ने मान्यता दी। इतना ही नहीं, मदर टेरेसा ने 'निर्मल हृदय' और 'निर्मला शिशु भवन' के नाम से आश्रम खोले। जिनमें वे असाध्य बीमारी से पीड़ित रोगियों व गरीबों की स्वयं सेवा करती थीं। जिसे समाज ने बाहर निकाल दिया हो, ऐसे लोगों पर इस महिला ने अपनी ममता व प्रेम लुटाकर सेवा भावना का परिचय दिया। मदर टेरेसा ऐसी रोशनी  का नाम है.
Dr. Kanhaiya Tripathi


कलकत्ता जीवन नहीं जन्नत देने लगा
पीड़ित मानवता के लिए समर्पित मदर टेरेसा ने स्वयं सेवी संस्थाओं का जाल बिछा दिया । 'मिशनरीज ऑफ चेरिटी' नामक संस्थाओं के केन्द्र द्वारा ये संचालित होती हैं । नि:स्वार्थ भाव से मानव सेवा के लिए समर्पित इसके माध्यम से सेवा कार्य में संलग्न हैं । 'मिशनरी ब्रादर्स ऑप चेरिटी' नाम से पुरुषों के लिए भी एक संगठन है। एक और संस्था है 'मदर टेरेसा के सहयोगी कार्यकर्ता' इसमें विविध धर्म, हर क्षेत्र और हर प्रकार की सहायता के लिए द्वार खुले हुए हैं।
कलकत्ता के लोअर सरक्युलर मार्ग पर बेसहारा बीमार बच्चों के लिए 'निमर्ल शिशु भवन' नामक संस्था संचालित है! इसके माध्यम से देश भर की इसकी शाखाओं में तीन हजार से भी अधिक बच्चे पल रहे हैं। जिन्हें उनके माता-पिता ने निर्मम होकर मरने के लिए बेकार मान कर फेंक दिया था, वे मदर टेरेसा से प्यार पाए । उन्हें सुयोग्य नागरिक बनने की शिक्षा-दीक्षा के लिए इन केन्द्रों में पर्याप्त प्रबंध सेंट मदर टेरेसा ने किया ।
कलकत्ता के काली मंदिर के पास ही एक धर्मशाला में 'निर्मल ह्रदय' स्थापित है। मृत्यु की प्रतीक्षा करते लोगों के लिए इसमें सेवा-सुश्रुषा की व्यवस्था है। इस तरह के ३२ से अधिक केन्द्र देश में संचालित हैं, जिनमें २००० से भी अधिक बेसहारा मरणासन्न रोगियों को वात्सल्य् भरी मानसिक शांति और सुश्रुषा उपलब्घ कराई जाती है।
कलकत्त्ते के पास ही शांतिनगर में कुछ रोगियों के लिए ३४ एकड़ भूमि में इलाज के लिए पुनर्वास और रोजगार के लिए साधन जुटाये है। इस तरह के ६७ केन्द्रों के द्वारा ४४, ००० से भी अधिक कुष्ठियों की चिकित्सा तथा रोजगार की व्यवस्था है।
स्कूलों, डिस्पेन्सरियों में, मातृ एवं शिश गृहों, रिलीफ सेन्टर  आदि के माध्यम से हजारों बच्चें, बीमारों, अनाथों, विकलांगों आदि को सहायता दी जाती है। इस प्रकार 'समाज-सेवा, को नहीं, मानव-सेवा' का मूल केन्द्र मानकर 'मदर टेरेसा' ने मूक मानवता की बहमूल्य सेवा की है। उनकी सेवा संस्थाओं का जाल तेजी से फैला, यह पीड़ित मानवता के लिए बहुत ही शुभ है। जो कलकता कभी लोगों के लिए मरण-स्थल था वही जन्नत बन गया यह कोई मदर ही कर सकती थीं। इसमे कोई दो  मत नहीं कि मदर टेरेसा इस कार्य को सम्पन्न की हैं.
'सादा जीवन उच्च विचार' की मूर्ति  मदर टेरेसा  का जीवन वास्तव में  बहुत ही सादा था ।   वे बिना थके लोगों की सेवा करती थीं, नवीन चावला उन्हें बार-बार याद करते हुए कहते हैं, 'जब मैंने उनसे पूछा कि आप एक कुष्ठ रोगी को कैसे साफ करती हैं, तो उन्होंने मुझे समझाया कि ये मरीज नहीं है, मेरे लिए ये मेरा भगवान है। ये मेरे लिए जीजस क्राइस्ट है। जो बच्चा सड़क पर मिलता है, वह भी भगवान है, जो लंदन के वाटरलू ब्रिज के नीचे रहते हैं, वे भी भगवान हैं। जो कोई उनके साथ बात भी नहीं करता और मैं उनको खाना देती हूँ। तो मेरे लिए ये सब लोग जीसस क्राइस्ट हैं। ये सब मेरे भगवान हैं। शायद यही बात उन्हें गरीबों और असहायों की मदद को प्रेरित करती थी।' करुणा की इससे बड़ी मिसाल क्या हो सकती है.
दो नवम्बर, २००७ को जब भारतीय प्रथम महिला राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटील कोलकाता पहुंचीं तो वह भाव विहवल हो गयीं. उन्होंने उस अहिंसा, करुणा और सेवा की प्रतिमूरी के बाते में कहा १९८४ में मदर टेरेसा की उपस्थिति में मदर टेरेसा महिला विश्वविद्यालय एक महान हस्ती, असाधारण मानवतावादी और नोबल पुरस्कार विजेता के नाम पर स्थापित हुआ था, यह महिलाओं को विशेषकर शिक्षा द्वारा गरीब और वंचित महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए पूर्णतः समर्पित असाधारण संस्था है. यह एक राष्ट्रपति द्वारा कहा गया, यह शब्द हमें बताते हैं कि वह कितनी महान महिला थीं. मदर टेरेसा को ही याद करते हुए महामहिम प्रतिभा देवीसिंह पाटील जी ने यह कहा कि
यदि सभी बृक्ष मिलकर एक बृक्ष बन जाएँ तो वह कितना विशाल बृक्ष होगा,
यदि सभी नदिया मिल कर एक नदी बन जाएँ तो वह कितनी विशाल नदी होगी।
यदि विश्व की सभी महिलाओं का स्वर एक हो जाए तो विश्व में शान्ति, समृधि और खुशहाली लाने के लिए, वह कितना शक्तिशाली स्वर बन जाएगा।”
हमें महामहिम के इन शब्दों को मदर टेरेसा के सेवा, प्रेम, करुणा और सद्भावनारूपी स्वर के रूप में लेना चाहिए और निःसंदेह उस महान महिला के कदमों पर दो कदम चलकर कुछ करना चाहिए। मदर टेरेसा 5 सितम्बर, १९९७ को हमसे रुखसत हो गयीं लेकिन उनके खींचे लकीर आज हमें सेवाभावना के लिए खींच रहे हैं. भारत की महिलायें जो महिला प्रश्न की राजनीति कर रहीं हैं उन्हें खास तौर पर मदर सीख दे रहीं हैं कि कुछ स्वयं करके बुलंद हो जाओ किसी मर्द से माँगने पर भीख से अच्छा है कि मिसाल बनो.
मदर टेरेसा के कर्त्तव्य भावना और सेवा भावना से यह भी सीखने को मिलता है कि मनुष्य जाति सेवा से जो कतराती है उसको तो इस भावना को निकाल देना चाहिए कि वह अगर किसी अपाहिज को सड़क पार करा देगा तो उसका समय नष्ट हो जाएगा. हमारे हिन्दुस्तान में सेवा भावना खत्म हो रही है इसमें दो मत  नहीं, वह कैसे फिर अपना अस्तित्वा पाएगी यह महत्वपूर्ण प्रश्न है. भारत एक अरब, इक्कीस करोर आबादी वाला देश है. आज इसमे जितनी तेजी से आबादी का विकास हो रहा है उतनी तेजी से सेवा भावना का क्षरण भी जारी है , यह न हिन्दुस्तानी जनता के हित में है न ही मदर टेरेसा के सेवाभाव का कोई प्रभाव। इस जड़ता को मदर त्यागने की हमसे अपेक्षा कर रहीं हैं, अब देखना यह है कि इसमे अगुआई कौन करता है.
वह आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कीर्ति और उनका कार्य हमारी प्रेरणा का आधार है. महिलायें मदर के रस्ते पर चलकर पुरुषों को आगे ला सकतीं हैं। वह स्वयं कब आगे बढकर पुरुषों को आगे लाती हैं इस वक्त के इंतज़ार में सभी हैं.
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा-४४२००१ (महाराष्ट्र)
मो. 09765083470, Email: hindswaraj2009@gmail.com